Wednesday, April 15, 2015

क्या क्रांति सिर्फ इसीलिए रूकी रहेगी
 कि हमने गलत प्रतीकों को चुना!

सुना था जब जमीन पकती है
 तब आती है क्रांति!
 कैसे पकती है ये जमीन?

माथे पर पडने वाली परेशानी के सलवटों से,
पेट में घटते अनाज से,
ईमान पर चिपके खटमलों से!

इनसे ही तो पकती थी जमीन !

फिर आज क्या हुआ?
तो क्या क्रांति संकेतों के इंतजार में,
कसिी अंधेरी खोह में दुबकी रहेगी ?

न जानना कहां तक अच्छा है !
 ज्ञान कहां तक वर है
कहां से अभिशाप है!

सीमा निर्धारण के रास्ते
मरूभूमि की रेत से
असंख्य अनगनित!

Tuesday, December 23, 2014


जीने के बहाने
बहानोँ से चलती है जिँदगी।
पहली अभिव्यक्तिसे चला सिलसिला-
अंतिम साँस पर ही रूकता है।
बहुत ही वेराइटीज है-
छोटे, बडे,गंभीर, चुटकीले,
हर रंग ,हर रस में  सराबोर।
   बस जरुरत है इनोवेटीव रहने की।
   कंटेपररी रहने की।
बहुत से बहाने-
आउट आँफ डेट हो जाते हैं ।
पर कुछ तो कौए की जीभ खाये आते हैं ।
अच्छी,बुरी,आडी,तिरछी
सीधी,टेढी हर दृष्टि के बहाने।
  बहाने ही बहाने।
घर देर से आने के बहाने,
काँलेज न जाने के बहाने,
थियेटर में पापा के मिलने पर किये बहाने,
भाई की फ़ीस खो जाने के बहाने।
   बडे ही मजेदार हैं बहाने।
रिश्तों को न मानने के बहाने,
घूस खाने के बहाने,
लंबी क्यू में जबरदस्ती आगे लगने के बहाने,
बस में टिकट न लेने के बहाने,
काम न करने के बहाने।
  बडे ही अनोखे हैं बहाने।
  इन बहानों में उलझा इंसान,
जीवन को जीने के बहाने-
जब ढूंढ नहीं पाता।
कोई भी इनोवेशन तब काम नहीं आता।



हर साल बर्बाद किये देशों में इजाफा होता गया !
और हम सब चुपचाप बैठे रहे |
इंतजार था हमें-दानव का!
के इससे ही दोस्ती कर लें-बच जायेंगे|
पर क्या,
इंसान को भट्टी में झोंकते दानव,
इनका मतलब समझते हैं ?
अजीब लगता है-
जब सोचती हूं-कैसे लोग होंगे वहां |
क्या हमारे जैसे ही-बेबस
जो अपने सर हजारों खून का बोझ ढोने पर मजबूर हैं|
या पूरी नस्ल ही,
उस घास की तरह है-जिसने यदुवंश का नाश किया!
और ये-
पूरी इंसानियत को खत्म करेंगे|
देखती हूं-के हम सब डरे हैं|
दानव कहता है-मैं तुम्हारा नेता हूं|
कोइ साथ नहीं देता,
पर विरोध का स्वर भी  नहीं है|
क्या पूरी इंसानियत इस तरह-

इस जलील, कायरता पूणं
मौत मरेगी !

अग्निशिखा
मैं जड़ हूँ –

सौंदर्य ,गंध से हीन।
मैं तुम्हारी इच्छा पुष्प नहीं ,
ना जूही की कली।
मैं तुम्हारे ह्र्दय पर थिरकती मुस्कान हूँ ।

मैं तुम्हारे रस-स्वप्न की-
स्वर्ण मूर्ति का आलिंगन नही ।
मैं तुम्हारी रगों में –बहता ज्वाल हूँ ।

मैं तुम्हारी तृषा को पूर्ण करती राह नही –
खींच ले जाये जो अगम को –मैं वो चित्कार हूँ ।
मैं तुम्हारे गात को शीतल करती पय-धार नहीं ,
श्रुति मात्र से जल उठो- मैं वो भ्रष्ट राग हूँ ।

मैं जड़ हूँ –
सौंदर्य ,गंध से हीन।
मैं तुम्हारी इच्छा पुष्प नहीं ,
ना जूही की कली।

            मैं तुम्हारे विश्वाश पर चोट करती-क्रांति उदगार हूँ ।


राख में दबे शोलों की सरगोशी,

ज्वालामुखी से निकली लपटों से भी तेज़ है।

मैं उनमें कंडे डाल कर-

सेंकती हूँ ह्रदय और आत्मा।

सेंकती हूँ रोटियाँ –जली-जली।

दबी बातें,


सिर्फ विस्फोट ही करती हैं ।

चिनगारी चाहे लाख दबी हो,

किसी चूल्हे की आग नहीं बनती।


ब्लैकहोल

हब भी सोचती हूँ ,
कि कुछ लिखूँ-तुम्हारे बारे में ,
तो शब्द ही नहीं मिलते।
भला इतनी विरक्ति-
क्या शब्द थाम पायेंगे !
तब भी जब बैठती हूँ –
तो याद ही नहीं रहती।
क्या लिखूँ?
दिल,दिमाग सब पर शून्य!
तुम्हारे लिए कैसी कंगाली है?
न शब्द
न भावना
न याद।
                       

                         यहाँ तक कि शिकायत भी नहीं