Tuesday, December 23, 2014

अग्निशिखा
मैं जड़ हूँ –

सौंदर्य ,गंध से हीन।
मैं तुम्हारी इच्छा पुष्प नहीं ,
ना जूही की कली।
मैं तुम्हारे ह्र्दय पर थिरकती मुस्कान हूँ ।

मैं तुम्हारे रस-स्वप्न की-
स्वर्ण मूर्ति का आलिंगन नही ।
मैं तुम्हारी रगों में –बहता ज्वाल हूँ ।

मैं तुम्हारी तृषा को पूर्ण करती राह नही –
खींच ले जाये जो अगम को –मैं वो चित्कार हूँ ।
मैं तुम्हारे गात को शीतल करती पय-धार नहीं ,
श्रुति मात्र से जल उठो- मैं वो भ्रष्ट राग हूँ ।

मैं जड़ हूँ –
सौंदर्य ,गंध से हीन।
मैं तुम्हारी इच्छा पुष्प नहीं ,
ना जूही की कली।

            मैं तुम्हारे विश्वाश पर चोट करती-क्रांति उदगार हूँ ।


राख में दबे शोलों की सरगोशी,

ज्वालामुखी से निकली लपटों से भी तेज़ है।

मैं उनमें कंडे डाल कर-

सेंकती हूँ ह्रदय और आत्मा।

सेंकती हूँ रोटियाँ –जली-जली।

दबी बातें,


सिर्फ विस्फोट ही करती हैं ।

चिनगारी चाहे लाख दबी हो,

किसी चूल्हे की आग नहीं बनती।


ब्लैकहोल

हब भी सोचती हूँ ,
कि कुछ लिखूँ-तुम्हारे बारे में ,
तो शब्द ही नहीं मिलते।
भला इतनी विरक्ति-
क्या शब्द थाम पायेंगे !
तब भी जब बैठती हूँ –
तो याद ही नहीं रहती।
क्या लिखूँ?
दिल,दिमाग सब पर शून्य!
तुम्हारे लिए कैसी कंगाली है?
न शब्द
न भावना
न याद।
                       

                         यहाँ तक कि शिकायत भी नहीं 
हम क्या कहें !

तुम तो हमें सिरे से ही नकार जाते हो।
एक बार नहीं ,हजार बार –
हम तुम्हारी कठोर दहलीज रक्तस्नात कर जाते हैं ।

क्या तुम जानते हो?
हम से तुम्हारीदहलीज तक के रास्ते-

तुम्हारे चाबुक से उधडी,
हमारी लाशों से भरे पडे हैं ।
और जब तुम-
हम अर्धमृत लाशों पर,
अपने रथ पे सवार –
सैर को निकलते हो,
तुम्हारे रथ के पहिए
हमारे खून से ही चमकते हैं ।
और तुम कहते हो,


कि हम अब भी कुछ कहें ।
बस कहें ! बस कहें ही।

लाशों को ढोती पीढ़ी नाराज है

लाशों को ढोती पीढ़ी नाराज है

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                                           ज़ुदा रास्ते

मेरी बातें तुम्हारी जैसी नहीं ,

ना सरल,न सीधी,
ये सपाट हैं ।
ना इसमें समुद्र की गहराई है,
ना पर्वतों सी
ऊँचाई ।
यह समुद्र पर फैली-
तेल की धार है।
मुझे विष-अमृत का,
घोल बनाना नहीं आता।
मैं उसे वैसे ही पेश करती हूँ –अल्हदा।
नहीं जानती शब्दों के जाल में –
अर्थ को घुसाते,छिपाते- तुमने की ईमानदारी

या
 अप्रिय सत्य का ज़खीरा पटकते-मैंने।
मुझे बस इतना पता है-चाहना एक ही है।
बस तुम जरा हाथ को घूमाकर नाक पकड्ते हो-
मैं सीधे गर्दन।


Friday, January 3, 2014


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